Friday, June 14, 2013

Vedas - वेद - 1. ऋग्वेद 2. यजुर्वेद 3. सामवेद 4. अथर्ववेद।



वेद शब्द संस्कृत भाषा के चार "विद्" और एक "विद्लृ" धातुओं
से बना है। जिनका अर्थ हैं- विद सत्तायाम् - (सत्तार्थ)
होना; विद विचारे - विचार करना; विद ज्ञाने - ज्ञान करना,
जानना; विद चेतनाख्याननिवासेषु - प्रेरणा देना, खोलकर
बताना तथा जीवन का आधार होना; विद्लृ लाभे - प्राप्त
करना इत्यादि। इन सब का संयोग से पदार्थ बनेगा - परमाणु से
लेकर परमात्मा तक सब सत्ताओं का विचारपूर्वक

ज्ञानविज्ञान जहां हो, उक्त ज्ञानविज्ञान के आधार पर
मानविक कर्मों के विषय में विधि-निषेधरूप प्रेरणा देना और
सत्य का मण्डन तथा असत्य का खण्डन खोलकर कहना,
नित्यजीवन का आधार होना आदि जिसका कर्तव्य हो,
आत्मा आदि अत्यन्त रहस्यमय पदार्थों तक
की प्राप्ति जिसके बिना सम्भव नहीं हो वह वेद ह
अर्थात् जिस से हमें ज्ञान का लाभ,
ईश्वर आदि अनन्यप्रमाणसिद्ध पदार्थों की सत्ता का बोध
(ज्ञान), विचार आदि उत्तम कर्मों की विधि, विद्या, सुख
आदि उत्तम पदार्थों की प्राप्ति होती हो वही Ved Hai
वेद सनातन धर्म के प्राचीन पवित्र
ग्रंथों का नाम है । केवल इन ग्रन्थों में ही वेद शब्दार्थ लागू
होता है, जिन में ज्ञान, कर्म, उपासना के समग्रविवरण
उपलब्ध है। ज्ञानादि तीनों का सामूहिक नाम है त्रयीविद्या,
इसलिये वेदों का 'त्रयी' भी नाम होता है। वेदों को श्रुति
भी कहा जाता है, क्योंकि पहले मुद्रण
की व्यवस्था बिना इनको एक दूसरे से सुन- सुनकर याद
रखा गया इस प्रकार वेद प्राचीन भारत के वैदिक काल की
वाचिक परम्परा की अनुपम कृति है जो वंशानुगत रूप से
हज़ारों वर्षों से चली आ रही है । नित्यवस्तुवों का अस्तित्व
नित्य होने से उनका ज्ञान भी नित्य होना अनिवार्य है। ईश्वर
के अलावा दूसरी कोई वस्तु नहीं है जो कि नित्यज्ञान
का आधार हो। इसलिये भारतीय विचारधारा मैं वेद अपौरुषेय और
ईश्वररचित माने जाते हैं। वेद ही सनातन धर्म के सर्वोच्च और
सर्वोपरि धर्मग्रन्थ हैं।
वेदों का निरूपम महत्व
भारतीय संस्कृति में सनातन धर्म के मूल और सब से प्राचीन
ग्रन्थ वेद हैं।
हिन्दू धर्म अनुसार आर्षयुग में ब्रह्माऋषिदेव:कोटी से लेकर
जैमिनि तक के ऋषि-मुनियोंने शब्दप्रमाण के रूप में
इन्हीं को माने हैं और इनके आधार पर अपने
ग्रन्थों का निर्माण भी किये हैं।
हिन्दू धर्म में ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, इतिहास
आदि महाग्रन्थ वेदों का व्याख्यानस्वरूप हैं।
ऋषिदेव:कोटी कणाद "तद्वचनादाम्नायस्य प्राणाण्यम्"
और "बुद्धिपूर्वा वाक्यकृतिर्वेदे" कहकर वेद को दर्शन और
विज्ञान का भी स्रोत माना है।[कृपया उद्धरण जोड़ें]
हिन्दू धर्म अनुसार सबसे प्राचीन नियमविधाता महर्षि मनु
ने कहा "वेदोऽखिलो धर्ममूलम्" - खिलरहित वेद अर्थात् मूल
संहितारूप वेद धर्मशास्त्र का आधार है -
न केवल धार्मिक किन्तु ऐतिहासिक दृष्टि से
भी वेदों का असाधारण महत्त्व है। वैदिक युग के
आर्यों की संस्कृति और सभ्यता जानने का एकमात्र साधन
यही है।
मानव-जाति और विशेषतः आर्यों ने अपने शैशव में धर्म और
समाज का किस प्रकार विकास किया इसका ज्ञान वेदों से
ही मिलता है।
विश्व के वाङ्मय में इनसे प्राचीनतम कोई पुस्तक नहीं है।
आर्य-भाषाओं का मूलस्वरूप निर्धारित करने में वैदिक
भाषा अत्यधिक सहायक सिद्ध हुई है।
वेदवेत्ता महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वती देव:कोटी के
विचार में ज्ञान, कर्म, उपासना और विज्ञान वेदों के विषय
हैं। जीव, ईश्वर, प्रकृति इन तीन अनादि नित्य सत्ताओं
का निज स्वरूप का ज्ञान केवल वेद से ही उपलब्ध होता

वैदिक वाङ्मय का शास्त्रीय स्वरुप
वर्तमान काल में वेद चार माने जाते हैं। उनके नाम हैं-
(१) ऋग्वेद, (२) यजुर्वेद, (३) सामवेद तथा (४) अथर्ववेद
द्वापरयुग की समाप्ति के पूर्व वेदों के उक्त चार विभाग अलग-
अलग नहीं थे। उस समय तो ऋक्, यजुः और साम - इन तीन
शब्द-शैलियों की संग्रहात्मक एक विशिष्ट अध्ययनीय शब्द-
राशि ही वेद कहलाती थी। विश्व में शब्द-प्रयोग की तीन
शैलियाँ होती है; जो पद्य (कविता), गद्य और गानरुप से
प्रसिद्ध हैं। पद्य में अक्षर-संख्या तथा पाद एवं विराम
का निश्चित नियम होता है। अतः निश्चित अक्षर-
संख्या तथा पाद एवं विराम वाले वेद-मन्त्रों की संज्ञा ‘ऋक्’
है। जिन मन्त्रों में छन्द के नियमानुसार अक्षर-
संख्या तथा पाद एवं विराम ऋषिदृष्ट नहीं है, वे गद्यात्मक
मन्त्र ‘यजुः’ कहलाते हैं और जितने मन्त्र गानात्मक हैं, वे
मन्त्र ‘साम’ कहलाते हैं। इन तीन प्रकार की शब्द-प्रकाशन-
शैलियों के आधार पर ही शास्त्र एवं लोक में वेद के लिये ‘त्रयी’
शब्द का भी व्यवहार किया जाता है।
वेद के पठन-पाठन के क्रम में गुरुमुख से श्रवण एवं याद करने
का वेद के संरक्षण एवं सफलता की दृष्टि से अत्यन्त महत्त्व
है। इसी कारण वेद को ‘श्रुति’ भी कहते हैं। वेद परिश्रमपूर्वक
अभ्यास द्वारा संरक्षणीय है, इस कारण इसका नाम ‘आम्नाय’
भी है।
द्वापरयुग की समाप्ति के समय श्रीकृष्णद्वैपायन वेदव्यास
जी ने यज्ञानुष्ठान के उपयोग को दृष्टिगत उस एक वेद के चार
विभाग कर दिये और इन चारों विभागों की शिक्षा चार
शिष्यों को दी। ये ही चार विभाग ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और
अथर्ववेद के नाम से प्रसिद्ध है। पैल, वैशम्पायन, जैमिनि और
सुमन्तु नामक -चार शिष्यों को क्रमशः ऋग्वेद, यजुर्वेद,
सामवेद और अथर्ववेद की शिक्षा दी। इन चार शिष्यों ने शाकल
आदि अपने भिन्न-भिन्न शिष्यों को पढ़ाया। इन शिष्यों के
द्वारा अपने-अपने अधीत वेदों के प्रचार व संरक्षण के कारण वे
शाखाएँ उन्हीं के नाम से प्रसिद्ध हैं। वेदों को तीन भागों में
बांटा जा सकता है - ज्ञानकाण्ड, उपासनाकाण्ड और
कर्मकाण्ड।
चतुर्वेद
वेद चार हैं- ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद एवं अथर्ववेद। प्रत्येक
वेद की अनेक शाखाएं बतायी गयी हैं। यथा ऋग्वेद की 21,
यजुर्वेद की 101, सामवेद की 1001, अर्थववेद की 91 इस
प्रकार 1131 शाखाएं हैं परन्तु 12 शाखाएं ही मूल ग्रन्थों में
उपलब्ध हैं। वेद की प्रत्येक शाखा की वैदिक शब्द राशि चार
भागों में उपलब्ध है। 1. संहिता 2. ब्राह्मण 3. आरण्यक 4.
उपनिषद्। इनमें संहिता को ही वेद माना जाता है। शेष वेदों के
व्याख्या ग्रन्थ हैं। वेद तो चार ही हैं- 1. ऋग्वेद 2. यजुर्वेद
3. सामवेद 4. अथर्ववेद।
1. ऋग्वेद - ऋग्वेद को चारों वेदों में सबसे प्राचीन
माना जाता है। इसको दो प्रकार से बाँटा गया है। प्रथम प्रकार
में इसे 10 मण्डलों मंे विभाजित किया गया है।
मण्डलों को सूक्तों में, सूक्त में कुछ ऋचाएं होती हैं। कुल ऋचाएं
1052 हैं। दूसरे प्रकार से ऋग्वेद में 64 अध्याय हैं। आठ-आठ
अध्यायों को मिलाकर एक अष्टक बनाया गया है। ऐसे कुल आठ
अष्टक हैं। फिर प्रत्येक अध्याय को वर्गों में विभाजित
किया गया है। वर्गों की संख्या भिन्न-भिन्न अध्यायों में भिन्न
भिन्न ही है। कुल वर्ग संख्या 2024 है। प्रत्येक वर्ग में कुछ
मंत्र होते हैं। सृष्टि के अनेक रहस्यों का इनमें उद्घाटन
किया गया है। पहले इसकी 21 शाखाएं थीं परन्तु वर्तमान में
इसकी शाकल शाखा का ही प्रचार है।
2. यजुर्वेद - इसमें गद्य और पद्य दोनों ही हैं। इसमें यज्ञ
कर्म की प्रधानता है। प्राचीन काल में इसकी 101 शाखाएं
थीं परन्तु वर्तमान में केवल पांच शाखाएं हैं - काठक, कपिष्ठल,
मैत्रायणी, तैत्तिरीय, वाजसनेयी। इस वेद के दो भेद हैं - कृष्ण
यजुर्वेद और शुक्ल यजुर्वेद। कृष्ण यजुर्वेद का संकलन
महर्षि वेद व्यास ने किया है। इसका दूसरा नाम तैत्तिरीय
संहिता भी है। इसमें मंत्र और ब्राह्मण भाग मिश्रित हैं। शुक्ल
यजुर्वेद - इसे सूर्य ने याज्ञवल्क्य को उपदेश के रूप में
दिया था। इसमें 15 शाखाएं थीं परन्तु वर्तमान में माध्यन्दिन
को जिसे वाजसनेयी भी कहते हैं प्राप्त हैं। इसमें 40 अध्याय,
303 अनुवाक एवं 1975 मंत्र हैं। अन्तिम चालीसवां अध्याय
ईशावास्योपनिषद है।
3. सामवेद - यह गेय ग्रन्थ है। इसमें गान विद्या का भण्डार
है, यह भारतीय संगीत का मूल है। ऋचाओं के गायन को ही साम
कहते हैं। इसकी 1001 शाखाएं थीं। परन्तु आजकल तीन
ही प्रचलित हैं - कोथुमीय, जैमिनीय और राणायनीय।
इसको पूर्वार्चिक और उत्तरार्चिक में बांटा गया है। पूर्वार्चिक
में चार काण्ड हैं - आग्नेय काण्ड, ऐन्द्र काण्ड, पवमान काण्ड
और आरण्य काण्ड। चारों काण्डों में कुल 640 मंत्र हैं। फिर
महानाम्न्यार्चिक के 10 मंत्र हंै। इस प्रकार पूर्वार्चिक में कुल
650 मंत्र हैं। छः प्रपाठक हैं। उत्तरार्चिक को 21 अध्यायों में
बांटा गया। नौ प्रपाठक हैं। इसमें कुल 1225 मंत्र हैं। इस
प्रकार सामवेद में कुल 1875 मंत्र हैं। इसमें अधिकतर मंत्र
ऋग्वेद से लिए गए हैं। इसे उपासना का प्रवर्तक
भी कहा जा सकता है।
4. अथर्ववेद - इसमें गणित, विज्ञान, आयुर्वेद, समाज
शास्त्र, कृषि विज्ञान, आदि अनेक विषय वर्णित हैं। कुछ लोग
इसमें मंत्र-तंत्र भी खोजते हैं। यह वेद जहां ब्रह्म ज्ञान
का उपदेश करता है, वहीं मोक्ष का उपाय भी बताता है। इसे
ब्रह्म वेद भी कहते हैं। इसमें मुख्य रूप में अथर्वण और आंगिरस
ऋषियों के मंत्र होने के कारण अथर्व आंगिरस भी कहते हैं। यह
20 काण्डों में विभक्त है। प्रत्येक काण्ड में कई-कई सूत्र हैं
और सूत्रों में मंत्र हंै। इस वेद में कुल 5977 मंत्र हैं।
इसकी आजकल दो शाखाएं शौणिक एवं पिप्पलाद ही उपलब्ध हंै।
अथर्ववेद का विद्वान् चारों वेदों का ज्ञाता होता है। यज्ञ में
ऋग्वेद का होता देवों का आह्नान करता है, सामवेद
का उद्गाता सामगान करता है, यजुर्वेद का अध्वर्यु
देव:कोटीकर्म का वितान करता है तथा अथर्ववेद का ब्रह्म पूरे
यज्ञ कर्म पर नियंत्रण रखता है।
वैदिक स्वर प्रक्रिया
वेद की संहिताओं में मंत्राक्षरॊं में खड़ी तथा आड़ी रेखायें
लगाकर उनके उच्च, मध्यम, या मन्द संगीतमय स्वर उच्चारण
करने के संकेत किये गये हैं। इनको उदात्त, अनुदात्त ऒर
स्वारित के नाम से अभिगित किया गया हैं। ये स्वर बहुत
प्राचीन समय से प्रचलित हैं और महामुनि पतंजलि ने अपने
महाभाष्य में इनके मुख्य मुख्य नियमों का समावेश किया है ।

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